बुधवार, 12 मई 2021

मरती इंसानियत

      
                                चित्र -गूगल से साआभार

"डॉक्टर मेरी मम्मी की हालत बहुत खराब है प्लीज एडमिट कर लीजिए"

डॉक्टर "इनका आरटी पीसीआर करवाया आपने"

"जी पॉजिटिव है,, आज शाम ही रिपोर्ट आयी है और इनकी तबियत भी काफी खराब हो गयी है"

डॉक्टर "देखिये हमारे पास बेड तो है नहीं लेकिन आप कुछ एक्सट्रा पैसे दे तो हम देखेंगें कुछ हो सका तो "

"डाॅक्टर प्लीज आप बेड अरेन्ज करके इलाज करिये पैसे हम सारे भर देगें"

डाॅक्टर "वार्ड बॉय इनको वार्ड नम्बर 5 मे एडमिट कर दीजिए" और लड़के की तरफ देखकर "आप आॅक्सीजन सिलेन्डर का भी इन्तजाम कर लीजिए हमारे पास ज्यादा आॅक्सीजन है नहीं "

लड़का "जी ठीक "

वो एक तरफ अपनी माँ को एडमिट करवाके आॅक्सीजन सिलेंडर लेने भाग। बड़ी मुश्किल से पैसों का इन्तजाम करके एक सिलेन्डर 30000 में ले आया। पैसों की बड़ी समस्या थी लेकिन किसी तरह इन्तजाम कर लिया आखिर माँ की जान पर बन आयी थी। 

अगले दिन माँ का अॉक्सीजन लेवल गिरा तो सिलेन्डर ने माँ की साँसें उखड़ने से बचा ली ये देखकर उसकी जान में जान आयी और इतना पैसा लगाना भी काम आ गया। 
इसी बीच डॉक्टर आये और लड़के से बोले "इन्हें रेमेडिसिविर के इन्जेक्शन लगाने होंगें और हमारे पास सारे इन्जेक्शन खत्म हो चुके हैं तो तुम बाहर से खरीद लाओ"

लड़का फिर से मेडिकल स्टोर के चक्कर काटने लगा। लगभग 15 मेडिकल स्टोर पर दौड़भाग करने के बाद किसी के बताने पर वो एक मेडिकल स्टोर पर पहुँचा और बोला "भईया रेमडिसिविर इन्जेक्शन दे दो"

मेडिकल स्टोर वाले ने उसकी तरफ तिरछी निगाहों से देखा और बोला "एक ही तो बचा है" और दूसरी साइड खड़े आदमी की ओर इशारा करके बोला "ये पन्द्रह हजार दे रहे हैं,, लेकिन तुम सोलह दे दो तो तुम ले जाओ"

इन्जेक्शन का दाम सुनकर लड़के के चेहरे पर निराशा फैल गयी। उसने जल्दी से अपने जेब से अपना पर्स निकला और उसमें रखे पैसे गिनने लगा। कुल मिलाकर 6 हजार रूपये थे उसके पास। 

तुरन्त ही उसने एक दो जगह कॉल किया लेकिन कुछ इन्तजाम नहीं हुआ। फिर उसने आशा भरी नजरों से मेडिकल स्टोर वाले को को देखा और बोला "भईया प्लीज मेरी मम्मी की तबियत बहुत खराब है और अभी मेरे पास सिर्फ 6 हजार रूपये ही बचे हैं। आप मुझे इन्जेक्शन दे दो ना.... मैं बाकी के पैसे भी आपको दो चार दिन में दे दूँगा"

मेडिकल स्टोर वाला "हाँ.. हाँ मैं तो यहाँ खैरात बाट रहा हूँ ना...जाओ पूरे पैसे लेकर आओ और इन्जेक्शन ले जाओ"

लड़का वहाँ से जल्दी से किसी रिश्तेदार के घर की तरफ भागा। अभी वो आधे रास्ते में ही था कि हॉस्पिटल से फोन आया कि उसकी माँ की साँसे चलना बन्द हो गयी हैं। उसकी माँ चली गयी। इतना सुनते ही लड़के के तो हाथ पैर सुन्न पड़ गये। 

कुछ देर बाद खुद को सम्भाल कर वो बेचारा किसी तरह वहाँ से वापस हॉस्पिटल आया और उनके अन्तिम संस्कार की तैयारी में लग गया। जान पहचान और रिश्तेदार तो कोरोना की वजह से पहले ही पीछे हट गये। जब वो श्मशान घाट पहुँचा तो वहाँ भी उसका नम्बर दस लोगों के बाद था। 

ऐसी हालत में बेचारा क्या करता फिर से लाइन में लगकर अपनी बारी का इन्तजार करने लगा...

ऐसे ही ना जाने कितने लोग लाइन में लगे हैं किसी को हास्पिटल में बेड चाहिए, किसी को दवा,  किसी को अॉक्सीजन तो किसी को श्मशान घाट पर जगह लेकिन कालाबाजारी और भ्रष्टाचार खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही। ऐसी हालत में भी लोग महिलाओं से हॉस्पिटल में भी छेड़छाड़ करने से बाज नहीं आ रहे। 
 इन्सान अब इन्सान नहीं गिध्द हो गया है ऐसा गिध्द जो जीवित लोगों को नोच -नोचकर खाने के तैयार खड़ा है... 

बुधवार, 5 मई 2021

क्या मुझे वो स्नेह मिल सकेगा..?

मैं दिन रात तुम्हारे ख्यालों में खोया रहता हूँ 
तुम्हें देखकर जीता हूँ और तुम पर ही मरता हूँ
तुम ही मेरे एहसासों में समाई हो 
तुमसे प्यार ही मेरे जीवन भर की कमाई है
तुम्हारी एक झलक के लिए हम बेकरार हैं
कैसे कहें कि कितना तुमसे प्यार है
तुम्हारे बिन तो ये जीवन भी बेकार है
क्या तुम्हें इन बातों का इल्म है?
तुम्हारे इन्तजार मैं बस आहें भरता हूँ
मन्दिर मस्जिद गुरूद्वारा हर जगह माथा टेक आया 
लेकिन तुम्हारे आने का कुछ पता नहीं 
इश्क़ किया है तुमसे इतनी बड़ी तो ये खता नहीं 
गर खता है भी तो आकर सजा दे दो
कम से कम इन एहसासों को समझकर 
इनको खत्म करने की ही वजह दे दो
अगर मैं भुला पाया इन एहसासों को 
तो तुम्हारा मुझ पर अहसान होगा 
और ना भुला पाया तो 
तुम्हें एक नजर देखकर जीना आसान होगा
मैं समझ जाऊँगा कि तुम
मेरे हाथों की इन लकीरें का हिस्सा बन न सकोगी
ज़िन्दगी के हर कदम में तुम मेरे साथ चल ना सकोगी 
मैं मान लूँगा कि जो स्नेह मैं तुमसे चाहता हूँ 
वो मुझे कभी मिल ना सकेगा
तुमसे गिला तो नहीं  लेकिन 
ये दिल फिर किसी से इश्क़ कर ना सकेगा ...

शनिवार, 1 मई 2021

गोविंद अब तो आ जाओ.....

                     चित्र -गूगल से साआभार

मुझमें मैं नहीं रह गया 
बस तुम ही समाये हो 
जीवन में फैली निराशा तो 
बस तुम ही याद आये हो
इस विपत्ति की घड़ी में 
गोविन्द अब तो आ जाओ
इस संकट के निकलने का 
कोई मार्ग तो सुझाओ
कितना तड़प रहें सब 
कुछ तो इसका हल बतलाओ
इस संकट की स्थिति को
गोविंद अब तुम ही निपटाओ
हर क्षण खत्म हो रहे जीवन में
आशा की एक किरण दिखाओ 
तिल -तिल मरते लोगों को 
तुम जीवन दान का उपहार दे जाओ 
मृत्यु के तांडव को रोककर 
उम्मीदों के की नाव चलाओ
सब को उसमें बैठाकर तुम 
इस संकट से पार लगाओ 
अब मत देर करो गोविन्द 
बस जल्दी से आ जाओ 
निस्तेज हो रहे जीवन को 
तुम अपने तेज से भर जाओ...

मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

आपदा या अवसर

कोरोना की दूसरी लहर ने इस समय देश में तबाही मचा रखी है। श्मशान घाटों पर जगह कम पड़ गयी। लगातार जलती लाशों के कारण भट्टियाँ भी पिघलना शुरू हो गयी हैं। लेकिन असल में तो इन्सान पिघल रहा है। उसकी उम्मीदें और आशायें भी उन भट्टियों में जलते शवों के साथ पिघल रही हैं। आँखों के सामने अपने प्रियजनों को इस तरह से दम तोड़ते देखना किसी सदमें से कम नहीं हैं। इस सदमें से हम श्याद ही कभी उबर पायें। जिस तरह से हॉस्पिटल के बाहर एम्बुलेंस की लाइनें लगी है उससे तो यही लगता है कि कोरोना इस बार किसी को बख्शनें के मूड़ में बिल्कुल नहीं है। देश के हर जिले में हालात हर घंटे बद से बदतर होते होते जा रहे हैं। मौत का आँकड़ा पुराने सारे रिकार्ड तोड़ रहा।

पता नहीं आगे क्या होगा अभी तक कोई भी वैक्सीन सौ फीसदी कोरोना को खत्म करने में सक्षम नहीं हो सकी है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो इस बार भारत में सम्भावना है कि कोरोना से लाखों जाने जायेगी। सरकार भी नियमों का पालन करने को तो कह रही है लेकिन चुनाव जरूर करवायेगी उसे नहीं टालेगी। सब अपनी जरूरत के हिसाब से चल रहें हैं। बहुत से हास्पिटल और एनजीओ भी इस बुरे दौर में अधिक से अधिक मद्द करने की कोशिश में लगे हैं लेकिन बहुत से स्वार्थी लोग इस मुश्किल वक्त में लोगों की मजबूरियों का फायदा उठा रहें हैं। दो सौ रूपये की दवा के दो हजार रूपये ले रहे हैं आपदा को अवसर में तो सही तरीके से इन्होंनें ही बदला है। 

अब लखनऊ की ही बात करते हैं। मेरे पापा की तबियत खराब थी आधी रात को उन्हें लेकर हम लेकर हास्पिटल पहुँचें। डॉक्टर को हमने पापा की नेगेटिव आरटी-पीसीआर की रिपोर्ट दी तो वो बोल पडे़ हम केजीएमयू की रिपोर्ट नहीं मानते आप हमारे लैब से टेस्ट करवाईये हम आरएमएल  की रिपोर्ट वैलिड मानते है और हम अभी इनको एडमिट भी नहीं करेंगें। कल आप लोग यहाँ आकर टेस्ट करवा लीजिए परसों रिपोर्ट नेगेटिव आयी तो हम एडमिट कर लेंगें। इतना बोलकर कुछ दवाई लिख दी और दस मिनट में ढाई हजार का बिल बन गया।
फिर पापा के आॅक्सीजन लेवल को देखकर बोले 94 -95 चल रहा है हो सकता है सुबह तक इनको आॅक्सीजन की कमी हो जाये तो आप लोग व्यवस्था कर लीजिए। इस तरह उन्होंनें हमें डरा दिया कि समझ ही नहीं आ रहा था हम क्या करें। पूरी रात उस समय हमने कैसे गुजारी है हम ही जानते हैं। खैर अगले दिन हमनें पापा का ब्लड टेस्ट करवाया शाम को पता चला उन्हें टायफाइड हुआ है। उसी शाम हमने दूसरे डॉक्टर से बात करके उनके टाइफाइड के इन्जेक्शन घर पर ही लगवाने शुरू कर दिये और अब पापा पूरी तरह से ठीक हैं। 
यहाँ लखनऊ में तो ऐसी आपदा के बीच भ्रष्टाचार और कालाबजारी अपने चरम पर है। इस स्थित में लोग लूट और कालबाजारी कर रहें हैं ना ईश्वर उनको जरूर इसकी सजा देगा। 

सब लोग अपना और अपनों का ख्याल रखें साथ ही इस चीज का भी ध्यान रखें की कब और किस टेस्ट की कितनी आवश्यकता है। जहाँ जरूरत हो दूसरों की मदद भी करें मोबाइल स्विच आफ करके ना बैठ जाये। 


शुरूआत हुई तो सब डरे से थे
कोरोना का नाम सुनकर मरे से थे
सब्जियाँ धुली और हाथ भी धोया 
साबुन से बारम्बार 
काढ़ा और गरम पानी को 
बनाया अपना हथियार 
हाथों को सैनेटाइज करके
 मिटा दी दो चार रेखा 
और कोरोना के डर से 
थियेटर का मुँह ना देखा 
घर में पड़े -पड़े बोर हुए 
लेकिन निकले ना एक भी बार 
दो गज की दूरी है जरूरी 
कहती है जो ये सरकार 
पालन किया सभी नियमों का 
फिर भी लटक रही तलवार 
चारों तरफ कोरोना ने 
मचाई है हाहाकर 
ताली बजाई, थाली बजाई 
बेमौसम दिवाली मनाई 
लेकिन खतरा टला नहीं 
आसानी से जाने वाली 
ये छोटी सी बला नहीं 
सब कुछ कर डाला हमने 
फिर कोरोना मरा नहीं 
बार -बार ये रूप बदलता 
गर्मी, सर्दी, बरसात में
मौसम की मार देख रहा ये 
हम इन्सानों के साथ में 
ज़िन्दगी को कर दिया बेकार 
बन गया कोरोना एक भार 
बहुत सहा ये अत्याचार 
सब नियम हो गये तार- तार
कोरोना ने कर दिया नया वार 
लगा दिया लाशों का अम्बार 
हमें घर में फिर बन्द करने को तैयार 
कोराना ने लिया नया अवतार 
वैक्सीन भी है लड़ने को तैयार
फिर भी नहीं रुक रहा वार 
बहुत बढ़ गया अत्याचार 
कितना सहें हम बार -बार 
कैसे करें इसका उपचार 
डॉक्टर भी इसके आगे लाचार 
अब तो चले जाओ यार.... 

रविवार, 11 अप्रैल 2021

फिर से लाॅकडाऊन

पाँच दिन से लगातार फिर से लॉकडाउन की खबरें उड़ रही हैं।कोरोना का कहर एक बार फिर से हम पर टूट रहा है।  कोरोना हमारे जीवन एक त्रासदी बनकर आया। ऐसी त्रासदी जिसकी वजह से ना जाने कितने लोगों को पलायन करना पड़ा। मीलों की पैदल यात्रा भूखे प्यासे गरीबों द्वारा तय की गयी। कुछ घर पहुँचे तो कुछ रास्ते में ही भूख और थकान से दम तोड़ गये। 

इन्सान तो इन्सान जानवरों का भी जीवन यापन कर पाना एक समस्या बन गया। पिछला लॉकडाऊन बड़ा भयवाह रहा। गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले तो कोरोना से ज्यादा भूखे ही मर गये।भूख एक बहुत बड़ी बीमारी बन गया जिसने कोरोना को एक झटके में मात दे दी थी।

लॉकडाऊन में तो सभी परेशान होते हैं लेकिन एक गरीब का सोचिए जो रोज कमाता है और शाम को कमाये पैसों से राशन खरीद कर लाता है तब उसके घर में खाना बनाता है। ऐसे लोग इस त्रासदी से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।  फिर वैसे ही हालत बन रहे...कोरोना फिर से अपने पाँव पसारा रहा है। पिछली बार श्याद मौतों का आँकड़ा इस बार की अपेक्षा बहुत कम था। इस बार अप्रैल शुरू होते ही कोरोना के केस और मौतों के आँकड़ों में इतनी ज्यादा बढोत्तरी हो गयी है कि फिर से लॉकडाऊन के कयास लगाये जा रहें हैं।
 
हमारे लखनऊ का हाल कुछ ज्यादा ही बुरा हो गया है। यहाँ एक तरफ हॉस्पिटल में बेड की कमी है तो दूसरी तरफ श्मशान घाट में जगह भी कम पड़ रही है। इस बार कोराना पिछली बार से बहत ज्यादा खतरनाक रूप में सामने आया है तो बेहतर यही कि खुद को बहुत अच्छी इम्यूनटी वाला समझ कर नियमों की अनदेखी ना करे। फिर से सैनेटाइजर और मास्क का उपयोग करना शुरू कर दें। क्योंकि अगर ऐसा ही चलता रहा तो सरकार को मजबूरन लाॅकडाऊन लगाना पड़ेगा। 

मेरे जान पहचान में दो लोगों की मौत इस एक हफ्ते में कोरोना से हो चुकी है और चार से पाँच लोग अभी भी संक्रमित है। आप सब अपना और अपने परिवार का ख्याल रखिये और सतर्क रहिये साथ ही इसे पिछले साल की तरह इसे कमजोर कोरोना मत समझिये। इस बार इसने जिसको भी अपनी गिरफ्त में लिया है उसमें से ज्यादातर लोग वेन्टिलेटर पर ही जा रहें हैं। मेरे घर से 300 मीटर की दूरी पर ही अस्पताल है जिससे जानकारी मिलती रहती हैं। यहाँ हालात बहुत बुरे हैं। बस बचाव ही उपाय है साथ ही जिन्होंनें वैक्सीन नहीं लगवाई है मेरा यही सुझाव है कि लगावा लें क्योंकि जिस स्पीड से कोरोना फैला रहा है लगता नहीं कि इसके संक्रमण से कोई बच पायेगा। जान है तो जहान है घर पर रहें सुरक्षित रहें,, जब अत्याधिक आवश्यक हो तभी बाहर निकलें। 

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

मेरे शिव

         
                        चित्र -गूगल से साअभार 

मेरे इष्ट तुम 
मेरी सृष्टि तुम 
तुम ही मेरे आधार हो 
मेरा मौन भी सुन लेते हो
तुम ही मेरे पालनहार हो
मेरी हर समस्या का समाधान 
झट से तुम कर देते हो
मेरी आँखों से आँसू गिरे तो 
सारे दुःख हर लेते हो 
तुम सार हो विस्तार हो 
मेरे जीवन का आधार हो 
मैं तुमको पूजती हूँ भोले 
तुम ही मेरे संसार हो
   ........हर -हर महादेव 

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

सत्ता- ए- प्रधान

चुनाव 

सत्ता तो हम यूपी वालों की कमजोरी है। हमारे यहाँ हर घर में हर एक व्यक्ति नेता बनना चाहता है। प्रधानी का चुनाव आते ही पूरे गाँव में अलग ही खुशी की लहर फैल जाती है। चुनाव आया नहीं कि लोगों के घरों में आने वालों का ताता लग जाता है। सीधा वोट माँगने कोई नहीं आता बस हाल चाल लेने आते हैं। उम्मीदवार पहले से ही पृष्ठभूमि तैयार करना शुरू कर देते है। जिनसे दुश्मनी रहती है उनके पैर छूकर उन्हें भी सम्मान का भागीदार बनाया जाता है। 
अब कल ही एक जन आये और हमारे चाचा का पैर पकड़कर उसे माथे से लगा लिया। मैं भी वही खड़ी थी।मैंनें अपने चाचा के लड़के से इशारे से पूछा 'भाई ये क्या ड्रामा है' तो वो धीरे से मेरे कान में बोला "दीदी बस देखती जाओ" फिर उस इन्सान ने चाचा के पैरों में लगी मिट्टी अपने हाथों में लेकर अपने माथे पर मलने लगा। मैं आँखें बड़ी करके उसे देख रही थी और भाई मुझे देखकर मुस्करा रहा था। तुरन्त ही वो आदमी चाचा से बोला "बस ऐसे ही आशीर्वाद बनाये रखना" और चला गया। उनके जाते ही भाई बोला "जिज्जी इसे कहते हैं प्रधानी का चुनाव"

अभी कुछ दिनों पहले ही कोर्ट के आर्डर से प्रधान के चुनाव की कुछ सीटों में बदलाव हो गया। जिसकी वजह से कई जगहों पर पुरूष सीट की जगह महिला सीट हो गयी। जो प्रत्याशी बनना चाहते थे उन्होंनें तुरन्त अपनी जगह अपनी पत्नी को खड़ा कर दिया। उस पत्नी को जिसकी शक्ल भी बहुत कम लोगों ने देखी होगी और हाँ इस समय चुनाव प्रचार भी जोरों से कर रहें हैं। पोस्टर पर पत्नी की फोटो भी छपवा रहें हैं लेकिन उसके नीचे पत्नी के नाम से ज्यादा हाइलाइट करके अपना नाम लिखवा रहें हैं क्योंकि पत्नी तो नाम की ही प्रधान रहने वाली हैं। वोट माँगने भी पत्नी की जगह स्वयं जा रहे हैं तो आप समझ ही सकते हैं कि मैडम जी जहाँ जरूरत हो सिर्फ हस्ताक्षर करने या अनूठा लगाने के काम आने वाली हैं। 
 लगभग साल भर पहले पंचायत वेबसीरीज आयी थी बस उसी के दर्शन चुनाव आते ही होने लगते हैं। यही सब देखते हुए मैंनें चन्द लाइने लिख दी। 


प्रधानी का चुनाव आया महिला की हो गयी सीट 

चार बार से हार रहे साहब अब कैसे हो जीत

साहब ने दिमाग लगाया अक्ल के घोड़ों को दौडाया 

पत्नी को प्रत्याशी बना कर कर दिया अपना काम 

साहब मन ही मन खुश हुए कि बन गये वो प्रधान

पत्नी बेचारी ना जाने किस कारण उसको खड़ा किया

किस गलती की सजा के कारण उसको चुनाव लड़ा दिया 

घूँघट वाली महिला का मुख  दर्शन हो गया आम 

फेसबुक पर मैडम की फोटो मचा रही कोहराम 

देखो भईया बनाने आयी महिला अब प्रधान 

जगह - जगह पोस्टर में वादों की एक लिस्ट छपी है

गजब बात ये है कि फोटो मैडम की भी छपी है

और नीचे लिखा हुआ है कि इनके पति हैं भोंदूराम 

आखिरकार जीतने के बाद करना है इन्हीं को काम 

और वोट माँगते घूम रहे पूरे गाँव में भोंदूराम 

आयी महिला सीट और बनेगी महिला ही प्रधान.....

मंगलवार, 30 मार्च 2021

बारिश


बारिश की गिरती बूँदों में 

तुम मुझे सुनाई पड़ते हो 

घनघोर रात के अँधेरें में 

तुम मुझे दिखाई पड़ते हो 

कैसे भूलू उन वादों को 

जो तूने ही सब तोड़ दिये

कैसे निकलूँ उन यादों से

जिनको तुम तो हो भूल चले 

ये बारिश की गिरती बूँदे

फिर से वैसे ही बरस रही 

जैसे बरसी थी पिछले बरस 

इस बार तेरे लिए तरस रही.. 


गुरुवार, 25 मार्च 2021

घूँघट और बुरका

                   चित्र - गूगल से साआभार

चाहे बुरका हो या घूँघट दोनों में ही महिलाओं को चेहरा ढकना पड़ता है। बुरके का इस्तेमाल मुस्लिम महिलायें या लड़कियाँ पुरुषों की निगाहों से बचने के लिए उपयोग करती हैं। मुस्लिम लड़कियों को बचपन से ही बुरके और हिजाब में रहना सिखाया जाता है। इसीलिए श्याद उनके लिए ये सामान्य बात हो जाती। मेरी खुद की कॉलेज की कई बैचमेट थी जो कॉलेज भी हिजाब पहनकर या बुरके में आती थी। 
मैंनें एकबार उससे पूछा भी था कि "कोई परेशानी नहीं होती तुम्हें इतनी गर्मी में" ?? 
तब उसने मुस्कराते हुए कहा "नहीं बचपन से पहन रही हूँ" 
मैंनें फिर से पूछा "तो तुम किसी फंक्शन में भी ऐसे ही रहती हो"
उसने तुरन्त ही कहा "हाँ इसमें क्या दिक्कत होगी"

इसके बाद में पास पूछने को कुछ नहीं था। इस चीज से एक बात समझ आ गयी कि बचपन से उन्हें इसी के अनुसार ढाला गया है तो इनके लिए ये बहुत सामान्य बात है। 

जहाँ तक घूँघट की बात है इसकी शुरूआत हिन्दु स्त्रियों ने मुस्लिम आक्रमणों के समय की स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए। अगर आप हमारे वेदो और पुराणों को पढ़ेगे तो उसमें मुँह ढँकने की परम्परा का कहीं उल्लेख नहीं मिलेगा। हिन्दुओं में घूँघट की परम्परा विवाह के बाद प्रारम्भ होती है। 
विवाह के पहले लड़कियों को मुँह नहीं ढँकना पड़ता। लेकिन विवाह होती ही वो इस कुप्रथा में बँध जाती है। विवाहित स्त्रियों को अपने ससुराल में घूँघट करना ही पड़ता है। यहीं से उसके लिए समस्याओं का जन्म होता है। शुरूआत घूँघट में रहने पर उसे अजीब से घुटन महसूस होती है पर धीरे -धीरे उसकी आदत बन जाती है। जहाँ सगाई और विवाह में वरमाला पर सब रिश्तेदार उसका मुँह देख लेते हैं फिर भी उसे ससुराल पहुँचते ही घूँघट में कैद कर दिया जाता है। 

मुझे समझ नहीं आता कि अब हम इस दौर में किससे और क्यों अपना मुँह छुपा रहें हैं।  अगर सामने वाले की नजरें या मानसिकता खराब है तो वो हमारे बुरके या घूँघट से सुधर तो नहीं जायेगी। घरवाले के सामने घूँघट करने का तर्क आजतक मेरी समझ से तो परे है। गाँव में लोग इसे सम्मान से जोड़कर रखते हैं। मैंनें तो लोगों को घूँघट किये घर के लोगों को गाली देते हुए भी सुना है तो इतना जरूर समझ में आ गया कि इसका सम्मान से दूर -दूर तक कोई वास्ता नहीं है। अब सच में समय आ गया है कि इस मुँह ढँकने की ढकोसलेबाजी से महिलाओं को आजादी मिल जाये। 

अगर इसे उनकी मर्जी पर छोड़ दिया जायेगा तो सम्भव है कि वो इससे कभी आजाद नहीं हो पायेगी कुछ महिलायें तो घूँघट हटाना चाहेगी लेकिन जो  महिलायें अब घूँघट की आदी हो चुकी हैं या बुजुर्ग महिलायें खुद भी इसका सपोर्ट करती हैं वो कभी इसे खत्म नहीं होनें देंगी। 
अभी जो बहस का मुद्द बना हुआ है ना अगर  महिलाओं ने पहले इसका विरोध किया होता तो श्याद स्थिति कुछ बेहतर होती। 

मैं सिर्फ ये कहना चाहती हूँ कि बुरका हो या घूँघट दोनों को ही अब भारत में बैन कर देना चाहिए।

रविवार, 21 मार्च 2021

खूबसूरत शाम

एक शाम यही पहाड़ों पर
तुम संग आना चाहता हूँ 
कुछ घंटें सूकून भरे 
तुम संग बिताना चाहता हूँ 
इसी बेंच पर तुम्हारा हाथ पकड़ 
अनगित बातें करनी है
इस ठंडी हवा की छुवन को 
मैं तुम संग महसूस करना चाहता हूँ 
सिन्दूरी शाम की आहट में 
चिड़ियों की चहचहाहट देखनी है
एहसासों की पोटली खोलनी हैं 
उम्मीदों की उड़ान भरनी है
डूबते सूरज की रंगीन आभा 
में तुम संग रंग जाना चाहता हूँ 
कुछ कहना नहीं चाहता बस 
बस खामोश रहना चाहता हूँ 
एक शाम यही पहाड़ो पर 
तुम संग आना चाहता हूँ 
ज़िन्दगी के कुछ पल 
यही बिताना चाहता हूँ...... 
 

मंगलवार, 16 मार्च 2021

को-रोना


ये कोरोना का रोना खत्म ही नहीं हो रहा। साल भर हो रहें लेकिन स्थिति तो जस की तस है। जब लगता है कि अब गया करोना तो उसका नया स्ट्रेन आ धमकता है। ये भगवान जी पता नहीं कोरोना को उठा क्यों नहीं ले रहे। कभी कभी तो लगता है कहीं करोना स्वर्गलोक से अमृत तो नहीं चख आया। खैर जो भी हो इन्सानों की हालत तो मास्क लगाकर ही खराब हुई जा रही है। ना - ना आप गलत सोच रहें,, अरे अब मास्क कोरोना नहीं चालान के डर से लगाये जा रहे हैं। 
हाँ जब कोरोना नया नया इस दुनिया में आया था तब चारों ओर उसकी चर्चा बहुत जोर -शोर से हो रही थी। न्यूज चैन पर सिर्फ कोरोना केस की ही खबरें दिखाई जाती थी। तब हमारे देश में थोडे लोग कोरोना से भयभीत हुये थे। फिर लॉकडाउन ने तो कोरोना के भाव बढ़ा दिया। कोरोना की प्रसिध्दि की चर्चा सम्पूर्ण विश्व में होने लगी। कोरोना के भाव इतने बढ़ेगे किसी ने सोचा भी नहीं था। न्यूज चैनल से लेकर  हर सोशल नेटवर्किंग साइट पर कोरोना बहुत दिनों तक ट्रेन्ड करता रहा। उस समय लोग कोरोना से इतना डर गये कि सब्जियाँ भी साबुन से धुली जाती थीं। सैनेटाइजर की तो बात ही मत पूछों। जिन्होंने कभी नाम भी नहीं सुना था कि सैनेटाइजर किस चिड़ाया का नाम है वो भी दस -दस बोतल सैनेटाइजर घर में रखे हुए थे और घर पर पड़े थोड़ी -थोड़ी देर में हाथ में सैनेटाइजर ऐसे रगड कर लगाते थे जैसे कोरोना के साथ हाथ से लकीरें भी मिटा देंगें। कोरोना को हम भारतीयों ने त्यौहार की तरह ही मनाया। पूरे लॉकडाउन हमने किचन में तरह -तरह की चीजे बनाकर आठ -दस किलो वजन भी बढ़ा लिया। विश्व के दूसरे देशों में लोग बचाव कर रहे थे और हमारे यहाँ अचार, पापड़, जलेबी,  समोसा और रसगुल्ले बन रहे थे। लॉकडाऊन का पूरा आनन्द तो हम भारतीयों ने लिया वो भी कोरोना से डरते हुए। 


गोविन्द ने कहा है जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी होगी तो समय के साथ कोरोना का प्रकोप घटा और धीरे -धीरे कोरोना केस में कमी आने लगी। हम जैसे लोगों को लगा कि यमराज कोरोना तक पहुँच गये। इससे उसकी प्रसिध्दि पर बुरा असर पड़ा और न्यूज चैनलों ने उसकी खबरें दिखाना लगभग बन्द ही कर दिया। लोगों के अन्दर से कोरोना का डर भी धीरे -धीरे कम हो गया। लोग बिना मास्क के घर से निकलने लगे और ये जो बार -बार हाथ सैनेटाइज करने की परम्परा शुरू हुई थी उसका पालन करना लोगों ने कम कर दिया। 

इसी बीच कोरोना की वैक्सीन आ गयी का हो - हल्ला भी मच गया। आजकल तो डेली टीकाकरण अभियान चल रहा है। सबके सब कोरोना को विदा करने की कोशिश में लगे हैं लेकिन श्याद अभी कोरोना को धरती छोड़ने की बिल्कुल इच्छा नहीं हैं। वैसे भी इतनी प्रसिध्दि के बाद भला कोई क्यों जाना चाहेगा।

इन सबका नतीजा यह हुआ कि कोरोना महाशय नाराज हो गये। अरे! भाई अर्श से फर्श पर आना किसे अच्छा लगता है। इसी समय कोरोना ने अपने व्यक्तित्व पर गहरा मंथन किया और निष्कर्ष निकाला कि अब मुझे कुछ नया करना होगा नहीं तो लोग मेरी वैल्यू खाँसी, जुकाम और बुखार के बराबर कर देंगे। 

फिर कोरोना जी ने खुद में कुछ बदलाव किये और फिर हाजिर हो गये सबके सामने नये रूप में। हमें जो लग रहा था कि यमराज कोरोना को उठा लेंगें उन्होंनें तो अपना रास्ता ही बदल दिया। जिसका टिकट हमें लग रहा था कन्फर्म लग रहा था वो वेटिंग रह गया। अब आलम ये है कि न्यूज चैनल भी सतर्कता से कोरोना के बढ़ते केस की खबरें चला रहें हैं और लोग फिर से मास्क पहनकर घर के बाहर निकल रहे हैं। वो कहतें हैं ना  "इतना मत डराओ कि डर ही खत्म हो जाये" तो कोरोना के साथ भी इस समय यही हो रहा लोगों ने अब इसे हल्के में लेना शुरू कर दिया है। सरकार ने चालान के रेट बढ़ा दिये है तो मास्क पहन कर निकलना जरूरी हो गया है। वैसे भी भारत की जनता नियमों का पालन तभी करती है जब पैनाल्टी बड़ी हो। छोटी -मोटी चीजों को भाव देना तो इनकी फितरत ही नहीं हैं। शुरू में तो कोरोना को भी भाव नहीं दिया 

कोरोना के नये स्ट्रेन से भारत में एक बार फिर केस बढ़ने लगे हैं। समय रहते सतर्कता बरतिये सिर्फ चालान के डर से नहीं कोरोना से लड़ने के लिए नियमों का पालन करिये। 

शनिवार, 13 मार्च 2021

मोबाइलीकरण


हाँ मोबाइलीकरण ही तो हो रहा है जब देखो सब हाथ में मोबाइल लिये उसकी स्क्रीन की तरफ नजर गडा़ये उस पर बार- बार  अपने अगूठे से उसे छूते रहते हैं। जब भी कुछ ढूँढना हो मोबाइल उठाया गूगल पर लिखा और जवाब समाने आ गया। कुछ सालों पहले सोचा ना था कि मोबाइल आने से ज़िन्दगी इतनी सुविधा जनक हो जायेगी और फोर जी की सुविधा ने तो सोने पर सुहागा वाला काम किया। 

अब तो हर सवाल का जवाब चन्द सेंकेंडों में मिल जाता। देश दुनिया में चल रही हर खबर चन्द सेकेण्ड में सब को मिल जाती है। खबरे वारल तो इतनी तेजी होती हैं जितनी तेजी से कभी भंडारे की जगह का भी पता नहीं चलता था। वाह रे मोबाइल की माया और सब को इन्टरनेट ने नचाया। मोबाइल तो इस कदर हमारे लिए जरुरी हो गया है कि उसके बिना हमारा खाना भी हजम नहीं होता। खाना खाने केे पहले  फोटो खींंचना भी एक परम्परा बन गया है।


 


ये सब तो चल ही रहा था कि कोरोना महाराज ने अपनी ग्रैन्ड एन्ट्री मारी और मोबाइल और इन्टरनेट की प्रसिद्ध को एक नये मुकाम तक पहुँचा दिया। 

कोरोना की वजह से हुए लॉकडाउन और अॉनलाइन क्लास के पचड़े ने तो इन्टरनेट कम्पनी वालों की झोली में हर दिन दिवाली वाली खुशी भर दी क्योंकि जहाँ सब खाने के लिये तरस रहे थे वहीं इनकी झोली में हर सेकेण्ड रिचार्ज के पैसे गिर रहे थे। इन्टरनेट डेटा प्रदान करने वाली कम्पनियों के लिए तो कोरोना और लॉकडाउन वरदान साबित हुआ। जहाँ सब कुछ लगभग बन्द हो चुका था वहीं इनका काम एक दम पीक पर था। सबको घर में रहना था अॉनलाइन ही काम करना था तो इन्टरनेट कम्पनियों में खुशियों की बहार आ गयी। दिन दुगुनी रात चौगुनी तरक्की भी बढ़ गयी। वहीं घर पर पडे़ निठ्ठले लोग जो इस नुक्कड़ से उस नुक्कड़ आवारागर्दी करते हुए पाये जाते थे उनके पास भी अब काफी समय था तो नाचते, गाते खूब वीडियों बनाये गये।

नतीजा ये हुआ कि बच्चों से लेकर बड़े तक हम सब मोबाइल के आदी हो गये हैं। बच्चे भी किताब से ज्यादा इन्टरनेट में किसी भी चीज को ढूँढने को महत्व देने लगे हैं। अब तो आलम ये है कि रात में सोने के पहले और सुबह उठते ही मोबाइल हाथ में नजर आता है। जिसके बिस्तर के पास चार्जिंग प्वांइट है उसे तो समझो स्वर्ग प्राप्त हो गया। आखिर इतनी अच्छी किस्मत सबको कहाँ मिलती है एक ही जगह पूर दिन पड़े रहो मोबाइल कीबैटरी खत्म हो फिर भी उठकर चार्ज करने जाने की मेहनत तो नहीं करनी पड़ेगी।

अगर यही हाल रहा तो ज़िन्दगी बद से बदतर होती जायेगी। अपनी ज़िन्दगी में चरस बोने वाले हम स्वंय होगे।अभी ज्यादा देर नहीं हुई हमें सम्भल जाना चाहिए नहीं तो कल को ज़िन्दगी में आने वाली हर परिस्थिति को समझने में मोबाइल काम नहीं आयेगा। 

रविवार, 7 मार्च 2021

महिला दिवस

महिला दिवस 

अब तक तो सबकी तैयारी पूरी हो गयी होगी। अरे! हाँ वही एक दिन के महिलाओं के सम्मान वाली। 8 मार्च महिला दिवस महिलाओं का स्पेशल दिन जो है। सरकारी हो या गैर सरकारी संस्था इस दिन को सैलिब्रेट करने की भरपूर कोशिश करती है। महिलायें भी इस एक दिन की इज्जत से प्रफुल्लित हो जाती हैं। प्रफुल्लित क्यों ना हो अब साल के 365 दिन में एक दिन लम्बे - लम्बे भाषणों के माध्मम से उसकी तारीफ की जाती से। महिला दिवस की आड में एकदिन सब अपने अॉफिस में पार्टी करते हैं। इस एक दिन को खास बनाने में कोई कमी नहीं की जाती। बधाई का भी एक लम्बा दौर चलता से। सोशल नेटवर्किंग साइट पर पर 8 मार्च को सिर्फ महिला दिवस की बधाई और उनकी तारीफ में कसीदे ही दौड़ती नजर आती हैं। रोड़ पर खड़े होकर लड़कियों को छेड़ने और ताड़ने वाले भी लम्बे -लम्बे पोस्ट लिख डालते हैं आखिरकार उन्हें भी तो दिखाना हो है कि वो महिलाओं कि कितनी इज्जत करते हैं।

लेकिन अगर महिला दिवस का लेक्चर देने वाले पुरुषों से पूछों कि क्या वो हर महिला के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा भाषण में बोला उन्होंने है या अपने घर में अपनी पत्नी के साथ वैसा व्यवहार करते हैं?? खैर इसका जवाब तो वो देंगें नहीं। ये महिला दिवस घर के बाहर काम करने वाली महिलाओं के लिए है मनाया भी जाता है घर के अन्दर चौबीसों घन्टे काम करने वाली महिला का ना कोई महिला दिवस होता है ना कोई छुट्टी।



महिला दिवस पर दिये गये भाषणों में जिस प्रकार उनके देवी होने करने की बात की जाती हैं ना उस देवी को तो वास्तविकता में समान अधिकार भी नहीं मिले हैं। महिला को मिलने वाली आजादी अभी पेपरों और भाषणों में ही सिमटी हुई है,,, ना किसी को उसके सम्मान का चिन्ता है ना जीवन की। बस पूरे समाज ने उसके लिए एक खाँचा तैयार कर दिया है और सब उसे उसमें फिट करने में लगे हैं। एक लड़की का जन्म होता है उसी दिन से उसे उस खाँचें में ढालने की प्रक्रिया शुरु हो जाती है। उसे हर दिन यही समझाया जाता है कि तुम्हें ऐसे  जोर से बोलना नहीं चाहिए, अपनी मर्जी से नहीं अपने माँ बाप की मर्जी से जीना है और शादी के बाद पति की मर्जी से।

एक रिजिड सोसाइटी के हिसाब से महिला को जीवन जीने को मजबूर किया जाता हूँ। उस क्या करना है क्या नहीं,, कैसे जीना है ये कोई और क्यों समझता है उसे क्या उसे अपनी मर्जी से जीने का अधिकार नहीं है। एक महिला को कैसे व्यवहार करना है कैसे नहीं ये वो सोसाइटी क्यों डिसाइड करती है जो समस्या आने पर कभी उसकी मदद नहीं करती सिर्फ उलाहना ही देती है।

महिलाओं की स्थिति में बदलाव लाने के अथक प्यास किये जा रहें हैं और ऐसा नहीं है कि कुछ सुधार नहीं हुआ है। पहले की तुलना में स्थिति कुछ बेहतर जरुर हुई है लेकिन जितना भाषणों में कहा जाती है ना उसकी पाँच प्रतिशत ही सुधार हुआ है।

इतने प्रयासों के बाद भी महिलाओं के साथ हो रहे अपराध में कमी नहीं आ रही है। आज भी महिलाओं को एक - एक कदम चलने के लिए असीम संघर्ष करना पड़ रहा है। पग - पग उसे छोटी और खराब मानसिकता का समना करना पड़ रहा है। हर कदम पर उसे दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है।

आप लोग महिला दिवस पर लम्बे -लम्बे और भारी भरकम शब्दों वालें भाषण दे ना दे उसका सम्मान अवश्य करे चाहे वह आपकी कुलीग हो या घर पर रहने वाली आपकी पत्नी। एक महिला को सम्मान से ज्यादा कुछ नहीं चाहिए होता है। महिलाओं को उनके हिस्से का सम्मान और उनको उनकी मर्जी से जीने की आजादी दे, उसे अपने बनाये गये खाँचें में ढालने की कोशिश ना करें। जिस दिन ये सब अधिकार महिला को प्राप्त हो जायेगा उस दिन महिला दिवस मनाना सार्थक हो जायेगा। 

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

अदीब शब्द का अर्थ

बहुत लोग मेरे ब्लाग का नाम सोचकर हैरान हो रहे होंगे कि ये कैसा नाम है या इसका अर्थ क्या है। मुझे लिखने का शौक था तो मैंनें सोचा क्यों  ना ब्लाग के माध्यम से है मैं अपने लेखन को एक मुकाम तक ले जाऊँ। क्योंकि मेरे घर या जान पहचान में दूर - दूर तक किसी का लेखन से कोई वास्ता नहीं है तो किसी से कोई सलाह मिल जाये ऐसी कोई उम्मीद तो थी नहीं। फिर मैंनें गूगल से ब्लाग के बारे में काफी  जानकारी इकट्टा की।
ब्लाग बनाने से पहले मैंनें काफी सारी रिसर्च गूगल से लेकर यूट्यूब तक की कि क्या कैसे करना है। वहाँ मुझे ब्लागर के बारे में पता चला जो हमें फ्री में ब्लाग बनाने की सुविधा देता है। 
 लेकिन ब्लागर पर आईडी बनाने से भी जरूरी काम था ब्लाग का नाम ढूँढना। क्योंकि ब्लाग के नाम के बिना तो ब्लाग बनेगा नहीं।  पहले तो मुझे लगा कि बड़ा आसान काम है अभी दस मिनट में नाम ढूँढ लेती हूँ लेकिन जब सोचने लगी तब समझ आया कि ये काम बड़ा मुश्किल था। मैं हिन्दी में अपना ब्लाग लिखने वाली थी इसीलिये मैं अपने ब्लाग का कोई हिन्दी नाम ही रखना चाहती थी।इस कोशिश में मैंनें कई नाम ट्राई किये लेकिन वो पहले से ही किसी और ने रख लिये तो मुझे नहीं मिला। दो दिन की कोशिश के बाद मुझे ये शब्द "अदीब" मिला। अदीब शब्द का अर्थ होता है "लेखक" ये अदीब शब्द मेरे लेखन के हिसाब से एकदम परफेक्ट है क्योंकि मैं यहाँ कहानियाँ और लेख लिखने वाली हूँ। मैं अपने ब्लाग का कोई ऐसा नाम नहीं रखना चाहती थी जो मेरे लेखन को सीमाओं में बाँध दे। मैं किसी एक टॉपिक पर नहीं बल्कि हर एक मुद्दे पर लिखना चाहती हूँ। तो इस लिहाज़ से ये अदीब शब्द एक दम सही लगा मुझे। 

वैसे भी अगर लेखक अपने लेखन को सीमित कर ले तो तो "जहाँ ना पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि"  की कहावत चरितार्थ कैैैैसे होगी।
आप सब लोग यू ही साथ बने रहिये और मेरे ब्लाग को पढिये और अपनी अमूल्य टिप्पणी अवश्य करिये... 

गुरुवार, 4 मार्च 2021

उम्मीद की किरण

 ज़िन्दगी हर दिन कुछ ना कुछ लेकर आती है। कुछ चीजें हमारे मन मुताबिक होती हैं तो कुछ एकदम उलट। कभी -कभी ऐसा भी वक्त आता है जब निराशा और हताशा हमें चारों ओर से  घेर लेती है। चारों तरफ अन्धेरा ही नजर आता है। उस समय महसूस होता है कि बस अब हमारी ज़िन्दगी में कुछ नहीं बचा, हमारी जिन्दगी बर्बाद हो गयी। यही समय होता है हमें खुद को पहचानने का,  उस एक वजह को ढूँढने का जो हमें निराशा से आशा की ओर ले जायेगा। यकीन मनिये यही वह वक्त होता है जब हम कोशिश करें तो ऐसा निखरकर बाहर आयेंगें कि हमें बिखेरने वाले के हाथ पछतावा ही आयेगा और वो हमारी जीत होगी... ऐसी जीत जो जीवन के किसी पथ पर हमें हारने नहीं देगी। 

कहीं पढ़ा था few bad chapters doesn't mean you're story is over यानी बुरा समय आने का मतलब ये नहीं है कि आप हार मान जाओ, उठो और लड़ो क्योंकि गिरना और उठना ये तो हम बचपन से ही सीखते हैं। पहली बार चलने की कोशिश में भी ना जाने कितनी बार हम लड़खड़ाते और गिरते हैं पर अन्त में हम चलना सीख ही जाते हैं उसी तरह हमें हर मुश्किल से लड़ने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए।

बुधवार, 3 मार्च 2021

कशमकश

कल तुम्हारा कॉल आया था। रिंगटोन सुनते ही मेेेेरे हाथ मोबाइल की तरफ बढ़े लेकिन तुम्हारा नाम पढ़कर अनायास ही पीछे हट गये, आँखें आसूँओं से डबडबा गयी। एक बार दिल किया कि कॉल रिसीव कर लूँ लेकिन फिर दिमाग ने ना कह दिया। दिल और दिमाग की कशमकश में दिमाग जीत गया और रिंगटोन की आवाज बन्द हो गयी। कुछ सेकेण्ड बाद फिर से कॉल आयी और एक बार फिर तुम्हारा नाम मोबाइल स्क्रीन पर चमकने लगा। मेरे हाथ मोबाइल के पास जाकर लौट आये। उगलियाँ अपने आप पीछे हो गयी। लेकिन फिर इस बार हिम्मत जबाव दे गयी और मोबाइल उठाकर मैंनें स्विच अॉफ कर दिया। जानते हो तुम्हारी कॉल का इन्तजार मैं कब से कर रही थी लेकिन देखो कॉल आयी और कट भी गयी। आज ना जाने किस खास वजह से तुमने मुझे कॉल किया था लेकिन वो वजह अब श्याद मेरे लिये बेवजह है। तुम्हारा नम्बर अभी तक सेव है मेरे मोबाइल,,, क्या करूँ डिलीट नहीं कर पाई वैसे तुमने तो मुझे अपनी ज़िन्दगी से कब का डिलीट कर दिया है। 
इतना लिखते ही उसकेआँखों से कई बूँद आसूँ  निकलकर उस पन्ने को भिगो गया... 

मंगलवार, 2 मार्च 2021

कैदी यादों के

कैदी.. हाँ हम कैदी ही तो हैं किसी ना किसी की यादों के, कुछ टूटी तो कुछ छूटी उम्मीदों के कुछ आधे -अधूरे ख्वाबों के, कुछ झूठे रह गये वादों के...
हम सब कैद से निकलने का भरसक प्रयास कर रहे हैं लेकिन क्या हम कभी इस कैद से आजाद हो पायेगे? 
 बड़ा मुश्किल हो जाता है यादों के कैद से निकलना और जीवन में बार ऐसे पल आते हैं जब हम ना चाहकर भी यादों के भँवर में फँसकर रह जाते हैं। 
पर मुझे लगता है कभी -कभी यादों का कैदी होना बुरा नहीं होता... क्योंकि यही हमारे चेहरे पर मुस्कान ले आती है.. 

कायर

समस्याओं से लड़कर ही हम 

बार -बार गिर पड़ते है

गिरकर उठना, उठकर गिरना 

कितना मुश्किल होता है

हमसे पूछो मुसीबत में 

कौन -कितना किसका होता है पर, 

हम वो कायर लोग नहीं जो 

चलने से डरते हैं

हम वो कायर लोग नहीं जो 

मजबूर होकर मरते हैं

हम तो वो मजबूत पेड़ हैं जो 

दिन प्रतिदिन बढ़ते हैं

पत्थरों को तोड़कर कर 

हम पानी से बहते हैं

हम वो बुजदिल लोग नहीं 

जो चलने से डरते हैं


मरती इंसानियत

                                       चित्र -गूगल से साआभार "डॉक्टर मेरी मम्मी की हालत बहुत खराब है प्लीज एडमिट कर लीजिए&q...