मंगलवार, 22 जून 2021

नदी

                  चित्र -गूगल साअभार 

निकल पडी गन्तव्य को अपने तुम्हें दूर है जाना 
संघर्षों के पथ को तुमने अपना जीवन माना 
पग-पग पर तुम टकराती हो जीवन की सच्चाई से
तोड़ के सारी बाधाओं को चलती तुम अलसाई सी
माना कि तुम थकी बहुत हो, पर तुम्हें दूर है जाना 
कदम दो कदम सुस्ता लो फिर तेजी से बढ़ जाना 
करो परिश्रम आगे बढो तुम, मंजिल अभी दूर है 
इतना लम्बा रास्ता है कि तुम छाया सुरुर है 
कहाँ तुम्हारी मंजिल है ये मैने अब पहचाना 
सागर से मिलने को चली तुम ये मैंनें है जाना....

24 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुंदर प्रेरक रचना। एक नही, वस्तुतः गतिशीलता और जीवन्त जीवन का द्योतक है। सागर की विशालता मे समाहित हो जाना ही इसकी नियति है।
    बहुत-बहुत शुभकामनाएँ ।।।।।

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  2. पग-पग पर तुम टकराती हो जीवन की सच्चाई से
    तोड़ के सारी बाधाओं को चलती तुम अलसाई सी---बहुत ही अच्छी और गहरी पंक्तियां...। अच्छी रचना के लिए खूब बधाईयां।

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  3. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार (25-06-2021) को "पुरानी क़िताब के पन्नों-सी पीली पड़ी यादें" (चर्चा अंक- 4106 ) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद सहित।

    "मीना भारद्वाज"

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  4. पग-पग पर तुम टकराती हो जीवन की सच्चाई से
    तोड़ के सारी बाधाओं को चलती तुम अलसाई सी

    वाह बहुत खूब ।

    सादर

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  5. कहाँ तुम्हारी मंजिल है ये मैने अब पहचाना
    सागर से मिलने को चली तुम ये मैंनें है जाना....
    नदी जीवन को बिना थके चलने की प्रेरणा देती है, बहुत ही सुंदर प्रीति जी

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  6. करो परिश्रम आगे बढो तुम, मंजिल अभी दूर है 

    इतना लम्बा रास्ता है कि तुम छाया सुरुर है 

    बहुत ही सुन्दर

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  7. बहुत सुंदर अभव्यक्ति।

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  8. बहुत बहुत अभिव्यक्ति, आदरणीया शुभकामनाएँ,

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