बुधवार, 18 अगस्त 2021

बिखरता जीवन

 
  चित्र गूगल से साआभार 

आज नहीं तो कल नींद आ ही जायेगी 
ये रोते बिलखते लोगों की चीखें 
उनकी साँसों को खा ही जायेंगी 
कब तक लड़ेगे ये खाली हाथ 
बात तो गुलामी तक आ ही जायेगी
जंजीरों को तोड़ना आसान नहीं होगा 
संकुचित विचारधारा में जीना 
अब इनको सीखना होगा 
अगर आज बच जायेगे तो 
कल सबको बन्दूकों चलना भी सीखना होगा
गुमनामी की ज़िन्दगी कैसे जियेंगें 
अंधकार में जाते भविष्य को कैसे सीयेगे
ऐसे विनाशकों के बीच कैसे जियेंगें...
           चित्र गूगल से साआभार

11 टिप्‍पणियां:

  1. संकुचित विचारधारा में जीना
    अब इनको सीखना होगा
    अगर आज बच जायेगे तो
    कल सबको बन्दूकों चलना भी सीखना होगा
    दार्दिक..
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  2. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार (20-08-2021) को "जड़ें मिट्‌टी में लगती हैं" (चर्चा अंक- 4162) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद सहित।

    "मीना भारद्वाज"

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार आपका मेरी रचना को शामिल करने के लिए

      हटाएं
  3. प्रश्न पर प्रश्न ..... बस सोच कुंद है ..... दहशत है । न जाने आगे क्या होना है ।

    जवाब देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  5. 𝐇𝐞𝐚𝐫𝐭 𝐓𝐨𝐮𝐜𝐡𝐢𝐧𝐠 𝐩𝐨𝐞𝐦.

    जवाब देंहटाएं
  6. इस दहशत का संम करने के लिए अपने समाज को खड़े होना होगा .. धर्म से आगे सोचना होगा ... सभी को ... सभी को ...

    जवाब देंहटाएं

प्रेम

स्त्रियां प्रेम को कई  हिस्सों में बाँटकर  अपना श्रृंगार करती हैं  और हर हिस्सा  अपने आप में  पूर्ण होता है गालों पर लालिमा  हों...